गांधी अपराजेय योद्धा : डॉ. रमन सिंह

राजनांदगांव। राजनांदगांव की धरती उस ऐतिहासिक पल की साक्षी बनी, जब कांस्टीट्यूशन क्लब ऑफ इंडिया के चुनाव में पूर्व सांसद प्रदीप गांधी ने सर्वाधिक 507 मत प्राप्त कर नया इतिहास रचा। यह केवल एक जीत नहीं, बल्कि संघर्ष, धैर्य और सतत संपर्क का परिणाम माना गया।

भव्य अभिनंदन समारोह में विधानसभा अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह ने प्रदीप गांधी को “अपराजेय योद्धा” की संज्ञा देते हुए कहा—
“गांधी जी ने हमेशा विपरीत परिस्थितियों में धैर्य बनाए रखा। अल्पमत में रहते हुए जिला परिषद अध्यक्ष का कार्यकाल पूरा करना, विधायक रहते हुए मित्र के लिए सीट त्यागना और सांसद रहते हुए लगातार संघर्षशील बने रहना उनकी संगठनात्मक मजबूती का उदाहरण है। अब कांस्टीट्यूशन क्लब में भारी मतों से मिली जीत ने इसे सिद्ध कर दिया कि सतत गतिशील व्यक्ति ही नये मुकाम हासिल करता है।”

समारोह में शुभकामनाओं की झड़ी लगी।
सांसद संतोष पांडे ने कहा कि संसद भवन में लोग अक्सर उन्हें और गांधी जी को एक-दूसरे से भ्रमित कर लेते हैं, जो उनकी पहचान की मजबूती का प्रतीक है।
पद्मश्री पुखराज बाफ़ना ने गांधी जी के संघर्षशील स्वभाव और संगठनात्मक पकड़ की सराहना की।

सवेरा संकेत के संपादक सुशील कोठारी ने कहा कि संघर्ष करते हुए पुनः अपनी पहचान स्थापित करना गांधी जी की विशेषता रही है और सर्वाधिक मत प्राप्त करना उनकी लोकप्रियता का प्रमाण है।
अपने संबोधन में प्रदीप गांधी ने कहा कि सांसदों और पूर्व सांसदों से मिला यह भरपूर समर्थन उनके लिए नई ऊर्जा का स्रोत है। उन्होंने संकल्प लिया कि कांस्टीट्यूशन क्लब को रचनात्मक ऊर्जा और नए प्रयोगों का केंद्र बनाया जाएगा।

कार्यक्रम में बड़ी संख्या में गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे, जिनमें बहादुर अली, किरण वैष्णव, कोमल सिंह राजपूत, सचिन बघेल, अंजू त्रिपाठी, संतोष अग्रवाल, सुशील मुंद्रा, विनोद लोहिया, दिनेश गांधी, राकेश ठाकुर, नरेंद्र राठी, सुशील धूत, डॉ. सूर्यकांत चितलांगिया, सुनील खंडेलवाल, अनिल बर्दिया, मोहन सिंह ढल्ला, अंजुम अल्वी, शरद खंडेलवाल, सुरेश गट्टानी, गोपाल खंडेलवाल, रोहित गुप्ता, हरीश गांधी, कीर्ति गांधी, शशि गट्टानी, अशोक चौधरी, डॉ. राजेश पांडे आदि प्रमुख रूप से शामिल थे।
कार्यक्रम का संचालन पूर्व मंडल अध्यक्ष रामकुमार वर्मा ने किया।
यह अभिनंदन समारोह प्रदीप गांधी की लोकप्रियता, संघर्षशीलता और संगठनात्मक ताकत का जीवंत उदाहरण बना, जिसने साबित कर दिया कि सच्चे जनप्रतिनिधि की पहचान पदों से नहीं, बल्कि जनता और संगठन से जुड़े उनके अटूट रिश्ते से होती है।
