DharamHapurUttar Pradesh

पितृपक्ष में भरणी महाश्राद्ध का विशेष महत्व, गयाश्राद्ध के समान फलदायी : पं. के.सी. पाण्डेय

हापुड़। पितरों की आत्मा की शांति और उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त करने के लिए प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा के दूसरे दिन से प्रारंभ होकर आश्विन कृष्ण अमावस्या तक सोलह दिन का महालय पक्ष या श्राद्ध पक्ष मनाया जाता है। यह अवसर अपने पूर्वजों को स्मरण करने और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का है। 7 सितंबर से प्रारंभ हुए इस महालय पक्ष में देशभर में श्रद्धालु परंपरानुसार श्राद्ध, तर्पण और दान कर अपने पितरों को प्रसन्न कर रहे हैं।

भारतीय ज्योतिष कर्मकांड महासभा के अध्यक्ष, ज्योतिर्विद पंडित के.सी. पाण्डेय ‘काशी वाले’ ने बताया कि श्राद्ध का विधान सदैव कुतुप (मध्यान्ह) या अपरान्ह काल में ही करना सर्वोत्तम माना गया है। उन्होंने बताया कि 11 सितंबर, गुरुवार को चतुर्थी एवं पंचमी श्राद्ध के साथ ही भरणी महाश्राद्ध भी किया जाएगा, जो पितृपक्ष में विशेष महत्व रखता है।

चतुर्थी-पंचमी एवं भरणी नक्षत्र का संयोग

पंडित पाण्डेय ने बताया कि चतुर्थी तिथि 10 सितंबर को दोपहर बाद 3:38 बजे से प्रारंभ होकर 11 सितंबर को दोपहर 12:45 बजे तक रहेगी। पंचमी तिथि 11 सितंबर दोपहर 12:45 से प्रारंभ होकर 12 सितंबर सुबह 9:58 बजे तक रहेगी। इसी प्रकार भरणी नक्षत्र 11 सितंबर अपरान्ह 1:58 से 12 सितंबर पूर्वाह्न 11:58 तक रहेगा।
उन्होंने कहा कि भरणी नक्षत्र में अपरान्ह काल का श्राद्ध अत्यंत फलदायक होता है। इस बार विशेष संयोग यह है कि 11 सितंबर को चतुर्थी तिथि का मध्यान्ह, पंचमी तिथि तथा भरणी नक्षत्र का अपरान्ह—सभी एक साथ प्राप्त हो रहे हैं, जो श्राद्ध के लिए अत्यंत शुभकारी और दुर्लभ योग है।

भरणी श्राद्ध का महत्व

पंडित पाण्डेय ने मत्स्यपुराण का उल्लेख करते हुए बताया—
“भरणी पितृपक्षे तु महती परिकीर्तिता।
अस्यां श्राद्धं कृतं येन स गयाश्राद्धकृद्भवेत्।।”

अर्थात्, पितृपक्ष में भरणी नक्षत्र का श्राद्ध अत्यंत प्रशस्त और उत्तम माना गया है। इस दिन किया गया श्राद्ध गया तीर्थ में किए गए श्राद्ध के बराबर फलदायी होता है। शास्त्रों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति भरणी नक्षत्र में विधिपूर्वक पितरों का तर्पण करता है, तो उसके पितृ तृप्त होकर उसे अखंड सुख, समृद्धि और आशीर्वाद प्रदान करते हैं।

सर्वार्थसिद्धि योग और श्राद्ध की परंपरा

उन्होंने आगे बताया कि 11 सितंबर को दोपहर 1:58 बजे तक सर्वार्थसिद्धि योग भी रहेगा। इस शुभ योग में किया गया श्राद्ध और भी अधिक कल्याणकारी होता है।
पंडित पाण्डेय ने कहा कि परंपरानुसार श्राद्ध में पिता पक्ष की तीन पीढ़ियां (पिता, पितामह, प्रपितामह) तथा माता पक्ष की तीन पीढ़ियां (माता, पितामही, प्रपितामही) का श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। इसके अतिरिक्त विधिपूर्वक पिण्डदान एवं ब्राह्मणों को भोजन कराने से पितृ प्रसन्न होकर वंशजों पर अपनी कृपा दृष्टि बनाए रखते हैं।

श्राद्ध का आध्यात्मिक संदेश

पितृपक्ष केवल धार्मिक अनुष्ठान का अवसर नहीं, बल्कि परिवार और समाज में पितरों के प्रति कृतज्ञता और स्मरण का पर्व भी है। शास्त्रों में कहा गया है कि पितरों के आशीर्वाद के बिना कोई भी कार्य पूर्णता प्राप्त नहीं करता। इसीलिए श्राद्ध, तर्पण और दान का महत्व प्रत्येक सनातन परिवार के लिए अत्यंत पवित्र और अनिवार्य माना गया है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button