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परमार्थ निकेतन में तीनों समय निरा़श्रतों के लिये निरंतर भंडारा सेवा

  • खुदीराम बोस के बलिदान दिवस पर उनकी राष्ट्रभक्ति को नमन
  • मातृभूमि के लिए मुस्कुराकर फांसी का फंदा चूमने वाले अमर वीर बलिदानी खुदीराम बोस
  • परमार्थ निकेतन और श्री जालाराम सेवा मंडल उत्तर गुजरात, रघुवंशी समाज द्वारा आयोजित भंडारा सेवा

ऋषिकेश। परमार्थ निकेतन के अध्यक्ष स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने अमेरिका की धरती से क्रान्तिकारी वीर बलिदानी खुदीराम बोस जी को आज उनके बलिदान दिवस पर श्रद्धाजंलि अर्पित करते हुये कहा कि आज का दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्णिम अक्षरों में अंकित है। यह वही दिन है जब मात्र 18 वर्ष की आयु में एक वीर, निडर और अदम्य साहस से भरे युवा क्रांतिकारी खुदीराम बोस ने हंसते.हंसते फांसी के फंदे को गले लगाया और अपने प्राण मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए अर्पित कर दिए। उनका यह बलिदान आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा का अमिट दीप बन गया।


स्कूल के दिनों में ही वे जुगंतर नामक क्रांतिकारी संगठन से जुड़ गए। उन्होंने अपने आदर्श महर्षि अरोबिंदो, बिपिन चंद्र पाल और अन्य क्रांतिकारियों की वाणी और कार्यों के दर्शन कर उनमें राष्ट्र के लिए प्राण देने का संकल्प भरा। उन्होंने स्पष्ट कहा यदि सौ जन्म भी मिले तो मैं हर बार यही मार्ग चुनूंगा। मातृभूमि की सेवा और स्वतंत्रता के लिए प्राण देना मेरा कर्तव्य है।
11 अगस्त 1908 की सुबह जब उन्हें फांसी के तख्ते की ओर ले जाया जा रहा था तब भी उनके चेहरे पर मुस्कान थी और होंठों पर वंदे मातरम् का नारा गूंज रहा था। उनका अदम्य साहस देखकर सभी स्तब्ध रह गए। हजारों भारतीयों की आंखों में आंसू थे लेकिन उनके हौसले और मुस्कुराहट ने हर दिल में क्रांति की ज्वाला जगा दी।


स्वामी चिदानन्द सरस्वती जी ने कहा कि खुदीराम बोस सिर्फ एक क्रांतिकारी ही नहीं थे, वे एक विचार थे, एक ऐसा विचार जो बताता है कि उम्र कभी भी साहस और बलिदान की राह में बाधा नहीं बनती। उनकी मुस्कुराती हुई शहादत आज भी हर भारतीय के हृदय में यह विश्वास जगाती है कि अपने देश के लिए कुछ भी करना संभव है, बशर्ते हमारे भीतर दृढ़ निश्चय और देशभक्ति का जुनून हो। वीर क्रान्तिकारी खुदीराम बोस का जीवन युवाओं के लिए एक संदेश है कि देश के लिए जियो और यदि आवश्यकता हो तो देश के लिए प्राण भी दो।
स्वामी जी ने कहा कि आज का दिन हमारे देश के लिए गर्व और सम्मान का दिन है। जब मात्र 18 वर्ष के युवा खुदीराम बोस ने हंसते-हंसते फांसी का फंदा गले लगाया था। उनके साहस ने पूरे देश के दिलों को झकझोर दिया। उनका छोटी सी उम्र में दिखाया गया इतना बड़ा जज्बा और बलिदान, हमें आज भी प्रेरणा देता है कि देश के लिए कुछ भी किया जा सकता है। खुदीराम बोस की आत्मा आज भी हमारे साथ है, जो हमें बताती है कि स्वतंत्रता की कीमत क्या होती है। आइए, उनके इस अमर बलिदान को याद करें, उन्हें नमन करें और अपने अंदर देशभक्ति की भावना को जागृत करें। उनका बलिदान और जज्बा हम सबके दिलों में हमेशा जीवंत रहेगा।
स्वामी जी ने युवाओं का आह्वान करते हुये कहा कि अपने कौशल, समय और ऊर्जा को राष्ट्र निर्माण में समर्पित करना ही सच्ची देशभक्ति है। हर युवा को चाहिए कि वह अपने कार्यक्षेत्र में श्रेष्ठता हासिल करे और समाज व देश की प्रगति के लिए योगदान दे। अपने अंदर त्याग, अनुशासन और परिश्रम की भावना विकसित करें, क्योंकि यही गुण राष्ट्र को ऊंचाइयों तक पहुंचाते हैं। शिक्षा, विज्ञान, तकनीक, संस्कृति या सेवा जिस भी क्षेत्र में हों, पूरे समर्पण से कार्य करें। जब हर युवा अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाएगा, तब ही एक समृद्ध, संगठित और गौरवशाली भारत का सपना साकार होगा और यही हमारे महान बलिदानियों को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
आज प्रातःकाल का यज्ञ और परमार्थ गंगा आरती इस महान बलिदानी क्रान्तिकारी खुदीराम बोस जी के बलिदान को समर्पित किया।
मानसून के इस मौसम में स्वर्गाश्रम और आसपास के क्षेत्र में रहने वाले साधु-संत, निराश्रित और जीवों के लिए भोजन और आवास का प्रबंध करना बहुत कठिन हो जाता है। ऐसे समय में प्रभु भजन के साथ सेवा का अवसर मिलना एक परम सौभाग्य की बात है।
आइए, हम सभी मिलकर इस पावन भूमि पर सेवा का दीप जलाएं और जरूरतमंदों के जीवन में खुशियाँ भरें। सेवा से बढ़कर कोई धर्म नहीं, और यही हमारी सबसे बड़ी साधना है।

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