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श्रीराम जन्मभूमि भूमिपूजन दिवस राष्ट्र के नव निर्माण का प्रतीक : स्वामी चिदानंद

  • श्रीराम जन्मभूमि भूमिपूजन दिवस की पांचवीं वर्षगांठ राष्ट्र की आस्था, एकता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक
  • राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी सीमाओं, सेनाओं या संसाधनों में नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, चरित्र और सामूहिक चेतना में निहित : स्वामी चिदानन्द सरस्वती

ऋषिकेश। श्रीराम जन्मभूमि भूमिपूजन दिवस यह तिथि भारतीय इतिहास के पावन पन्नों में स्वर्णाक्षरों से अंकित हो चुकी है। यह केवल एक मंदिर निर्माण की शुरुआत का दिन नहीं है बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक, आध्यात्मिक और राष्ट्रीय चेतना के जागरण का दिवस है। आज उस ऐतिहासिक भूमिपूजन की पाँचवीं वर्षगाँठ है, एक ऐसा दिन जब पूरे देश ने एक साथ मिलकर अपने आराध्य, मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के पुनः स्वागत का शुभारंभ किया था।
अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर हुए भूमिपूजन ने न केवल एक भव्य मंदिर की नींव डाली, बल्कि करोड़ों भारतीयों की आस्था, आत्मा और संस्कृति को सशक्त आधार प्रदान किया। यह वह क्षण था जब वर्षों से प्रतीक्षित सपना साकार हुआ और रामराज्य की कल्पना को साकार करने की दिशा में पहला ठोस कदम उठाया गया।


स्वामी चिदानन्द सरस्वती ने कहा कि आज, जब श्रीराम मंदिर का भव्य व दिव्य निर्माण हुआ और श्री रामलला अपने भव्य मंदिर में प्रतिष्ठित हो चुके हैं, तब यह आवश्यक है कि हम केवल पत्थरों की संरचना तक ही सीमित न रहें, बल्कि श्रीराम जी के आदर्शों को अपने जीवन में उतारने का संकल्प लें। भूमिपूजन की यह वर्षगाँठ केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मनिरीक्षण और संकल्प का अवसर है। आज का दिन भारतीय सांस्कृतिक और आध्यात्मिक इतिहास में एक ऐतिहासिक मोड़ का प्रतीक है।
आज इस ऐतिहासिक दिन की पाँचवीं वर्षगांठ पर, संपूर्ण भारतवर्ष में एक बार फिर से श्रद्धा, गौरव और राष्ट्रीय चेतना की भावना जागृत हो रही है। यह केवल एक मंदिर की नींव रखने का दिन नहीं है, अपितु यह भारतीय सभ्यता, आस्था और आत्मबल के पुनरुत्थान का दिन था। अयोध्या में भगवान श्रीराम जन्मभूमि पर हुए भूमिपूजन ने न केवल करोड़ों श्रद्धालुओं की भावना को सम्मान दिया, बल्कि भारत की आत्मा को नई ऊर्जा, दिशा और संकल्प प्रदान किया।
पांच वर्ष पूर्व जब भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के कर-कमलों से भूमिपूजन संपन्न हुआ, तो वह केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं था बल्कि यह भारतीयता की, न्याय की, और प्रतीक्षा की विजय का प्रतीक है। हजारों वर्षों की प्रतीक्षा, संघर्ष और संवैधानिक प्रक्रिया के बाद यह शुभ क्षण आया, जिसमें भारत की बहुसांस्कृतिक विरासत, सहिष्णुता और लोकतांत्रिक मूल्यों की परिपक्वता स्पष्ट रूप से परिलक्षित हुई।
अयोध्या सदियों से भारतीय आस्था का केंद्र रही है। भगवान श्रीराम केवल एक धार्मिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि मर्यादा, न्याय, सेवा और करुणा के प्रतीक हैं। श्रीराम जी का जीवन एक आदर्श व्यक्तित्व, एक आदर्श पुत्र, एक आदर्श राजा और एक आदर्श समाज सेवक का जीवन है। उनके जीवन सिद्धांत, सत्य, सेवा, संयम और समरसता, भारतीय शासन और समाज व्यवस्था की नींव रहे हैं। भूमिपूजन दिवस इस विचारधारा को पुनः स्मरण करने और जीवन में आत्मसात करने का दिव्य अवसर है।
श्रीराम मन्दिर का भूमिपूजन केवल एक संरचना की शुरुआत नहीं, बल्कि उस रामराज्य के पुनरुत्थान का भी संकेत था जिसमें सबके लिए न्याय, समानता और आत्म-सम्मान का स्थान हो।
आज, जब देश तकनीकी, आर्थिक और वैश्विक मंचों पर आगे बढ़ रहा है, तब आवश्यक है कि यह प्रगति हमारे सांस्कृतिक मूल्यों और मानवीय संवेदनाओं से जुड़ी हो। श्रीराम जी का आदर्श हमें स्मरण कराता है कि राष्ट्र की शक्ति केवल उसकी सीमाओं, सेनाओं या संसाधनों में नहीं, बल्कि उसकी संस्कृति, चरित्र और सामूहिक चेतना में निहित होती है।
वर्तमान सामाजिक परिप्रेक्ष्य में जब दुनिया तनाव, संघर्ष, और सामाजिक विषमताओं से जूझ रही है, तब भारत के लिए रामराज्य का मार्ग अत्यंत प्रासंगिक है।
पाँच वर्षों बाद, जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो यह स्पष्ट होता है कि 5 अगस्त 2020 एक युग परिवर्तन की शुरुआत थी। यह केवल आस्था की विजय नहीं थी, यह भारत की आत्मा की विजय थी, एक ऐसी आत्मा जो युगों-युगों तक विश्व को सत्य, अहिंसा, और सदाचार का मार्ग दिखाती रही है।

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