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पुरुषोत्तम मास : भक्ति, दान-पुण्य और आत्मकल्याण का दिव्य अवसर

रसिक प्रवक्ता श्री कनुआ जी महाराज ने बताया पुरुषोत्तम मास का महत्व

गोवर्धन/मथुरा। सनातन धर्म में समय-समय पर आने वाले पावन पर्व और विशेष मास केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि आत्मिक जागरण और जीवन को सकारात्मक दिशा देने का संदेश भी देते हैं। इन्हीं में एक अत्यंत पुण्यदायी एवं आध्यात्मिक महत्व वाला पुरुषोत्तम मास (अधिक मास) है, जिसे भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित माना गया है। इस मास में जप, तप, दान-पुण्य, कथा-श्रवण और प्रभु भक्ति का विशेष महत्व बताया गया है।

रसिक प्रवक्ता श्री कनुआ जी महाराज ने अपने आध्यात्मिक प्रवचन में पुरुषोत्तम मास के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह केवल एक अतिरिक्त महीना नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, संयम और प्रभु भक्ति का विशेष अवसर है। धार्मिक मान्यता के अनुसार जब इस मास को कोई स्वामी नहीं मिला और लोग इसे उपेक्षा की दृष्टि से देखने लगे, तब यह भगवान श्रीविष्णु की शरण में पहुंचा। भगवान ने प्रसन्न होकर इसे अपना नाम प्रदान किया और कहा कि आज से यह “पुरुषोत्तम मास” कहलाएगा।

उन्होंने कहा कि इस मास में श्रद्धा, विश्वास और भक्ति के साथ भगवान का स्मरण करने वाले भक्तों को विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है। पुरुषोत्तम मास मनुष्य को केवल बाहरी पूजा-पाठ तक सीमित नहीं रखता, बल्कि अंतर्मन को शुद्ध करने की प्रेरणा भी देता है।

महाराज श्री ने श्रद्धालुओं से सात्विक जीवन अपनाने का आह्वान करते हुए कहा कि इस दौरान क्रोध, लोभ, अहंकार और कटु वाणी का त्याग करना चाहिए। इसके स्थान पर प्रभु स्मरण, श्रीमद्भागवत कथा, रामायण पाठ, गीता अध्ययन, हरिनाम संकीर्तन, दान-पुण्य और सेवा कार्यों में समय लगाना चाहिए। उन्होंने बताया कि पुरुषोत्तम मास में अन्नदान, गौसेवा, जरूरतमंदों की सहायता तथा भगवान विष्णु की आराधना का विशेष महत्व माना गया है।

प्रवचन के दौरान उन्होंने भक्त प्रह्लाद और हिरण्यकश्यप की कथा का उल्लेख करते हुए कहा कि जब-जब अधर्म बढ़ता है, तब-तब भगवान अपने भक्तों की रक्षा और धर्म की स्थापना के लिए अवतार लेते हैं। मनुष्य को अपने भीतर झांककर दोषों का त्याग करना चाहिए। यदि मन में क्रोध है तो क्षमा लाएं, अहंकार है तो विनम्रता अपनाएं और मोह है तो उसे प्रभु भक्ति में समर्पित करें।

अंत में श्री कनुआ जी महाराज ने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि इस पावन मास में अधिक से अधिक समय सत्संग, कथा-श्रवण, प्रभु स्मरण और सेवा कार्यों में लगाएं, जिससे जीवन में आध्यात्मिक उन्नति, सुख, शांति और सकारात्मक ऊर्जा का संचार हो सके।

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